सन्ध्याके समय जब सारे वृन्दावनमें शरत्के चन्द्रमाकी चाँदनी छिटक जाती, तब श्रीकृष्ण उसका सम्मान करते हुए मधुर गान करते और गोपियोंके मण्डलकी शोभा बढ़ाते हुए उनके साथ रासविहार करते॥ ३४॥✎ 197198199
शरच्छशिकरैर्मृष्टं मानयन् रजनीमुखम्।
गायन् कलपदं रेमे स्त्रीणां मण्डलमण्डनः॥ ३४
सन्ध्याके समय जब सारे वृन्दावनमें शरत्के चन्द्रमाकी चाँदनी छिटक जाती, तब श्रीकृष्ण उसका सम्मान करते हुए मधुर गान करते और गोपियोंके मण्डलकी शोभा बढ़ाते हुए उनके साथ रासविहार करते॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 245) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)