श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

शरच्छशिकरैर्मृष्टं मानयन् रजनीमुखम्।

गायन् कलपदं रेमे स्त्रीणां मण्डलमण्डनः॥ ३४

śaracchaśikarairmṛṣṭaṃ mānayan rajanīmukham|

gāyan kalapadaṃ reme strīṇāṃ maṇḍalamaṇḍanaḥ|| 34

अर्थ

सन्ध्याके समय जब सारे वृन्दावनमें शरत्के चन्द्रमाकी चाँदनी छिटक जाती, तब श्रीकृष्ण उसका सम्मान करते हुए मधुर गान करते और गोपियोंके मण्डलकी शोभा बढ़ाते हुए उनके साथ रासविहार करते॥ ३४॥✎ 197 198 199

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
विदुरोद्धवसंवादे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #197 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #198 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #199 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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