उनके सारे शरीरमें रोमांच हो आया तथा मुँदे हुए नेत्रोंसे प्रेमके आँसुओंकी धारा बहने लगी। उद्धवजीको इस प्रकार प्रेमप्रवाहमें डूबे हुए देखकर विदुरजीने उन्हें कृतकृत्य माना॥ ५॥
पुलकोद्भिन्नसर्वाङ्गो मुञ्चन्मीलद्दृशा शुचः।
पूर्णार्थो लक्षितस्तेन स्नेहप्रसरसम्प्लुतः॥ ५
उनके सारे शरीरमें रोमांच हो आया तथा मुँदे हुए नेत्रोंसे प्रेमके आँसुओंकी धारा बहने लगी। उद्धवजीको इस प्रकार प्रेमप्रवाहमें डूबे हुए देखकर विदुरजीने उन्हें कृतकृत्य माना॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 241) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/5/