श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

क्षत्ता महाभागवतः कृष्णस्यैकान्तिकः सुहृत्।

यस्तत्याजाग्रजं कृष्णे सापत्यमघवानिति॥ २

kṣattā mahābhāgavataḥ kṛṣṇasyaikāntikaḥ suhṛt|

yastatyājāgrajaṃ kṛṣṇe sāpatyamaghavāniti|| 2

अर्थ

विदुरजी बड़े ही भगवद्भक्त और भगवान् श्रीकृष्णके अनन्य सुहृद‍् थे। इसीलिये उन्होंने अपने बड़े भाई धृतराष्ट्रको, उनके पुत्र दुर्योधनके सहित, भगवान् श्रीकृष्णका अनादर करनेके कारण अपराधी समझकर त्याग दिया था॥ २॥✎ 291

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #291 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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