नाथ! एकमात्र आप ही दुःखी जीवोंका दुःख दूर करनेवाले हैं और जो आपकी चरणशरणमें नहीं आते, उन्हें दुःख देनेवाले भी एकमात्र आप ही हैं’॥ २७॥
त्वमेकः किल लोकानां क्लिष्टानां क्लेशनाशनः।
त्वमेकः क्लेशदस्तेषामनासन्नपदां तव॥ २७
नाथ! एकमात्र आप ही दुःखी जीवोंका दुःख दूर करनेवाले हैं और जो आपकी चरणशरणमें नहीं आते, उन्हें दुःख देनेवाले भी एकमात्र आप ही हैं’॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 331) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/20/27/