॥ श्रीहरिः ॥
अहो रूपमहो धैर्यमहो अस्या नवं वयः।
मध्ये कामयमानानामकामेव विसर्पति॥ ३२
aho rūpamaho dhairyamaho asyā navaṃ vayaḥ|
madhye kāmayamānānāmakāmeva visarpati|| 32
अर्थ
‘अहो! इसका कैसा विचित्र रूप, कैसा अलौकिक धैर्य और कैसी नयी अवस्था है। देखो, हम कामपीड़ितोंके बीचमें यह कैसी बेपरवाह-सी विचर रही है’॥ ३२॥
अहो रूपमहो धैर्यमहो अस्या नवं वयः।
मध्ये कामयमानानामकामेव विसर्पति॥ ३२
‘अहो! इसका कैसा विचित्र रूप, कैसा अलौकिक धैर्य और कैसी नयी अवस्था है। देखो, हम कामपीड़ितोंके बीचमें यह कैसी बेपरवाह-सी विचर रही है’॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 332) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/20/32/