एक बार ब्रह्माजीने अपनेको कृतकृत्य-सा अनुभव किया। उस समय अन्तमें उन्होंने अपने मनसे मनुओंकी सृष्टि की। ये सब प्रजाकी वृद्धि करनेवाले हैं॥ ४९॥ मनस्वी ब्रह्माजीने उनके लिये अपना पुरुषाकार शरीर त्याग दिया। मनुओंको देखकर उनसे पहले उत्पन्न हुए देवता-गन्धर्वादि ब्रह्माजीकी स्तुति करने लगे॥ ५०॥ वे बोले, ‘विश्वकर्ता ब्रह्माजी! आपकी यह (मनुओंकी) सृष्टि बड़ी ही सुन्दर है। इसमें अग्निहोत्र आदि सभी कर्म प्रतिष्ठित हैं। इसकी सहायतासे हम भी अपना अन्न (हविर्भाग) ग्रहण कर सकेंगे’॥ ५१॥✎ 296
यह व्याख्या श्लोक 3.20.49 से 3.20.51 तककी एक साथ है।
स आत्मानं मन्यमानः कृतकृत्यमिवात्मभूः।
तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान्॥ ४९
एक बार ब्रह्माजीने अपनेको कृतकृत्य-सा अनुभव किया। उस समय अन्तमें उन्होंने अपने मनसे मनुओंकी सृष्टि की। ये सब प्रजाकी वृद्धि करनेवाले हैं॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 334) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/20/49/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)