श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.53

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तेभ्यश्चैकैकशः स्वस्य देहस्यांशमदादजः।

यत्तत्समाधियोगर्द्धितपोविद्याविरक्तिमत् ॥ ५३

tebhyaścaikaikaśaḥ svasya dehasyāṃśamadādajaḥ|

yattatsamādhiyogarddhitapovidyāviraktimat || 53

अर्थ

फिर आदिऋषि ब्रह्माजीने इन्द्रियसंयमपूर्वक तप, विद्या, योग और समाधिसे सम्पन्‍न हो अपनी प्रिय सन्तान ऋषिगणकी रचना की और उनमेंसे प्रत्येकको अपने समाधि, योग, ऐश्‍वर्य, तप, विद्या और वैराग्यमय शरीरका अंश दिया॥ ५२-५३॥

यह अर्थ श्लोक 52–53 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विंशोऽध्यायः॥ २०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें