॥ श्रीहरिः ॥
एवमुग्रश्रवाः पृष्ट ऋषिभिर्नैमिषायनैः।
भगवत्यर्पिताध्यात्मस्तानाह श्रूयतामिति॥ ७
evamugraśravāḥ pṛṣṭa ṛṣibhirnaimiṣāyanaiḥ|
bhagavatyarpitādhyātmastānāha śrūyatāmiti|| 7
अर्थ
नैमिषारण्यवासी मुनियोंके इस प्रकार पूछनेपर उग्रश्रवा सूतजीने भगवान्में चित्त लगाकर उनसे कहा—‘सुनिये’॥ ७॥ ✎ 292
एवमुग्रश्रवाः पृष्ट ऋषिभिर्नैमिषायनैः।
भगवत्यर्पिताध्यात्मस्तानाह श्रूयतामिति॥ ७
नैमिषारण्यवासी मुनियोंके इस प्रकार पूछनेपर उग्रश्रवा सूतजीने भगवान्में चित्त लगाकर उनसे कहा—‘सुनिये’॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 329) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/20/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #292 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में