श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

नैतद्बताधीश पदं तवेप्सितं

यन्मायया नस्तनुषे भूतसूक्ष्मम्।

अनुग्रहायास्त्वपि यर्हि मायया

लसत्तुलस्या तनुवा विलक्षितः॥ २०

naitadbatādhīśa padaṃ tavepsitaṃ

yanmāyayā nastanuṣe bhūtasūkṣmam|

anugrahāyāstvapi yarhi māyayā

lasattulasyā tanuvā vilakṣitaḥ|| 20

अर्थ

प्रभो! इस समय आपने हमें अपनी तुलसीमालामण्डित, मायासे परिच्छिन्‍न-सी दिखायी देनेवाली सगुणमूर्तिसे दर्शन दिया है। आप हम भक्तोंको जो शब्दादि विषय-सुख प्रदान करते हैं, वे मायिक होनेके कारण यद्यपि आपको पसंद नहीं हैं, तथापि परिणाममें हमारा शुभ करनेके लिये वे हमें प्राप्त हों—॥ २०॥

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