अथापि पृच्छे त्वां वीर यदर्थं त्वमिहागतः।
तद्वयं निर्व्यलीकेन प्रतिपद्यामहे हृदा॥ ५६
तो भी वीरवर! मैं आपसे पूछता हूँ कि इस समय यहाँ आपका आगमन किस प्रयोजनसे हुआ है; मेरे लिये जो आज्ञा होगी उसे मैं निष्कपट भावसे सहर्ष स्वीकार करूँगा॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.21.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 340) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/21/56/