श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.56

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अथापि पृच्छे त्वां वीर यदर्थं त्वमिहागतः।

तद्वयं निर्व्यलीकेन प्रतिपद्यामहे हृदा॥ ५६

athāpi pṛcche tvāṃ vīra yadarthaṃ tvamihāgataḥ|

tadvayaṃ nirvyalīkena pratipadyāmahe hṛdā|| 56

अर्थ

तो भी वीरवर! मैं आपसे पूछता हूँ कि इस समय यहाँ आपका आगमन किस प्रयोजनसे हुआ है; मेरे लिये जो आज्ञा होगी उसे मैं निष्कपट भावसे सहर्ष स्वीकार करूँगा॥ ५६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
एकविंशोऽध्यायः॥ २१॥

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