श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यतोऽभवद्विश्‍वमिदं विचित्रं

संस्थास्यते यत्र च वावतिष्ठते।

प्रजापतीनां पतिरेष मह्यं

परं प्रमाणं भगवाननन्तः॥ २०

yato'bhavadviśvamidaṃ vicitraṃ

saṃsthāsyate yatra ca vāvatiṣṭhate|

prajāpatīnāṃ patireṣa mahyaṃ

paraṃ pramāṇaṃ bhagavānanantaḥ|| 20

अर्थ

जिनसे इस विचित्र जगत‍्की उत्पत्ति हुई है, जिनमें यह लीन हो जाता है और जिनके आश्रयसे यह स्थित है—मुझे तो वे प्रजापतियोंके भी पति भगवान् श्रीअनन्त ही सबसे अधिक मान्य हैं॥ २०॥

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