इस प्रकार सुयोग्य वरको अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गये। चलती बार उसका वियोग न सह सकनेके कारण उन्होंने उत्कण्ठावश विह्वलचित्त होकर उसे अपनी छातीसे चिपटा लिया और ‘बेटी! बेटी!’ कहकर रोने लगे। उनकी आँखोंसे आँसुओंकी झड़ी लग गयी और उनसे उन्होंने देवहूतिके सिरके सारे बाल भिगो दिये॥ २४-२५॥✎ 1594
यह अर्थ श्लोक 24–25 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
अशक्नुवंस्तद्विरहं मुंचन् बाष्पकलां मुहुः।
आसिंचदम्ब वत्सेति नेत्रोदैर्दुहितुः शिखाः॥ २५
इस प्रकार सुयोग्य वरको अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गये। चलती बार उसका वियोग न सह सकनेके कारण उन्होंने उत्कण्ठावश विह्वलचित्त होकर उसे अपनी छातीसे चिपटा लिया और ‘बेटी! बेटी!’ कहकर रोने लगे। उनकी आँखोंसे आँसुओंकी झड़ी लग गयी और उनसे उन्होंने देवहूतिके सिरके सारे बाल भिगो दिये॥ २४-२५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 343) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/25/