श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अशक्नुवंस्तद्विरहं मुंचन् बाष्पकलां मुहुः।

आसिंचदम्ब५ वत्सेति नेत्रोदैर्दुहितुः शिखाः॥ २५

aśaknuvaṃstadvirahaṃ muṃcan bāṣpakalāṃ muhuḥ|

āsiṃcadamba vatseti netrodairduhituḥ śikhāḥ|| 25

अर्थ

इस प्रकार सुयोग्य वरको अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गये। चलती बार उसका वियोग न सह सकनेके कारण उन्होंने उत्कण्ठावश विह्वलचित्त होकर उसे अपनी छातीसे चिपटा लिया और ‘बेटी! बेटी!’ कहकर रोने लगे। उनकी आँखोंसे आँसुओंकी झड़ी लग गयी और उनसे उन्होंने देवहूतिके सिरके सारे बाल भिगो दिये॥ २४-२५॥✎ 1594

यह अर्थ श्लोक 24–25 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—आसिंचन्‍निव चात्मेति नेत्रो०।

    (मुद्रित पृष्ठ 343)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1594 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रसन्‍नता-पूर्वक → प्रसन्‍नतापूर्वक

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