॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.23.25
अंगं च मलपङ्केन संछन्नं शबलस्तनम्।
आविवेश सरस्वत्याः सरः शिवजलाशयम्॥ २५
aṃgaṃ ca malapaṅkena saṃchannaṃ śabalastanam|
āviveśa sarasvatyāḥ saraḥ śivajalāśayam|| 25
अर्थ
कमललोचना देवहूतिने अपने पतिकी बात मानकर सरस्वतीके पवित्र जलसे भरे हुए उस सरोवरमें प्रवेश किया। उस समय वह बड़ी मैली-कुचैली साड़ी पहने हुए थी, उसके सिरके बाल चिपक जानेसे उनमें लटें पड़ गयी थीं, शरीरमें मैल जम गया था तथा स्तन कान्तिहीन हो गये थे॥ २४-२५॥ सरोवरमें गोता लगानेपर उसने उसके भीतर एक महलमें एक हजार कन्याएँ देखीं। वे सभी किशोर-अवस्थाकी थीं और उनके शरीरोंसे कमलकी-सी गन्ध आती थी॥ २६॥ देवहूतिको देखते ही वे सब स्त्रियाँ सहसा खड़ी हो गयीं और हाथ जोड़कर कहने लगीं, ‘हम आपकी दासियाँ हैं; हमें आज्ञा दीजिये, आपकी क्या सेवा करें?’॥ २७॥