श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तां दृष्ट्वा सहसोत्थाय प्रोचुः प्रांजलयः स्त्रियः।

वयं कर्मकरीस्तुभ्यं शाधि नः करवाम किम्॥ २७

tāṃ dṛṣṭvā sahasotthāya procuḥ prāṃjalayaḥ striyaḥ|

vayaṃ karmakarīstubhyaṃ śādhi naḥ karavāma kim|| 27

अर्थ

कमललोचना देवहूतिने अपने पतिकी बात मानकर सरस्वतीके पवित्र जलसे भरे हुए उस सरोवरमें प्रवेश किया। उस समय वह बड़ी मैली-कुचैली साड़ी पहने हुए थी, उसके सिरके बाल चिपक जानेसे उनमें लटें पड़ गयी थीं, शरीरमें मैल जम गया था तथा स्तन कान्तिहीन हो गये थे॥ २४-२५॥ सरोवरमें गोता लगानेपर उसने उसके भीतर एक महलमें एक हजार कन्याएँ देखीं। वे सभी किशोर-अवस्थाकी थीं और उनके शरीरोंसे कमलकी-सी गन्ध आती थी॥ २६॥ देवहूतिको देखते ही वे सब स्त्रियाँ सहसा खड़ी हो गयीं और हाथ जोड़कर कहने लगीं, ‘हम आपकी दासियाँ हैं; हमें आज्ञा दीजिये, आपकी क्या सेवा करें?’॥ २७॥

यह व्याख्या श्लोक 3.23.24 से 3.23.27 तककी एक साथ है।

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