संसारमें जिस पुरुषके कर्मोंसे न तो धर्मका सम्पादन होता है, न वैराग्य उत्पन्न होता है और न भगवान्की सेवा ही सम्पन्न होती है वह पुरुष जीते ही मुर्देके समान है॥ ५६॥✎ 307308
नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते।
न तीर्थपदसेवायै जीवन्नपि मृतो हि सः॥ ५६
संसारमें जिस पुरुषके कर्मोंसे न तो धर्मका सम्पादन होता है, न वैराग्य उत्पन्न होता है और न भगवान्की सेवा ही सम्पन्न होती है वह पुरुष जीते ही मुर्देके समान है॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 352) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/23/56/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)