श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.56

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते।

न तीर्थपदसेवायै जीवन्‍नपि मृतो हि सः॥ ५६

neha yatkarma dharmāya na virāgāya kalpate|

na tīrthapadasevāyai jīvannapi mṛto hi saḥ|| 56

अर्थ

संसारमें जिस पुरुषके कर्मोंसे न तो धर्मका सम्पादन होता है, न वैराग्य उत्पन्‍न होता है और न भगवान्‌की सेवा ही सम्पन्‍न होती है वह पुरुष जीते ही मुर्देके समान है॥ ५६॥✎ 307 308

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #307 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #308 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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