॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.23.8
अन्ये पुनर्भगवतो भ्रुव उद्विजृम्भ-
विभ्रंशितार्थरचनाः किमुरुक्रमस्य।
सिद्धासि भुङ्क्ष्व विभवान्निज१धर्मदोहान्
दिव्यान्नरैर्दुरधिगान्नृपविक्रियाभिः ॥ ८
anye punarbhagavato bhruva udvijṛmbha-
vibhraṃśitārtharacanāḥ kimurukramasya|
siddhāsi bhuṅkṣva vibhavānnijadharmadohān
divyānnarairduradhigānnṛpavikriyābhiḥ || 8
अर्थ
अन्य जितने भी भोग हैं, वे तो भगवान् श्रीहरिके भ्रुकुटि-विलासमात्रसे नष्ट हो जाते हैं; अतः वे इनके आगे कुछ भी नहीं हैं। तुम मेरी सेवासे भी कृतार्थ हो गयी हो; अपने पातिव्रत-धर्मका पालन करनेसे तुम्हें ये दिव्य भोग प्राप्त हो गये हैं, तुम इन्हें भोग सकती हो। हम राजा हैं, हमें सब कुछ सुलभ है, इस प्रकार जो अभिमान आदि विकार हैं, उनके रहते हुए मनुष्योंको इन दिव्य भोगोंकी प्राप्ति होनी कठिन है॥ ८॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—निजवर्त्मदो।