श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

मया प्रोक्तं हि लोकस्य प्रमाणं सत्यलौकिके२।

अथाजनि मया तुभ्यं यदवोचमृतं मुने॥ ३५

mayā proktaṃ hi lokasya pramāṇaṃ satyalaukike|

athājani mayā tubhyaṃ yadavocamṛtaṃ mune|| 35

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—मुने! वैदिक और लौकिक सभी कर्मोंमें संसारके लिये मेरा कथन ही प्रमाण है। इसलिये मैंने जो तुमसे कहा था कि ‘मैं तुम्हारे यहाँ जन्म लूँगा’, उसे सत्य करनेके लिये ही मैंने यह अवतार लिया है॥ ३५॥ इस लोकमें मेरा यह जन्म लिंगशरीरसे मुक्त होनेकी इच्छावाले मुनियोंके लिये आत्मदर्शनमें उपयोगी प्रकृति आदि तत्त्वोंका विवेचन करनेके लिये ही हुआ है॥ ३६॥ आत्मज्ञानका यह सूक्ष्म मार्ग बहुत समयसे लुप्त हो गया है। इसे फिरसे प्रवर्तित करनेके लिये ही मैंने यह शरीर ग्रहण किया है—ऐसा जानो॥ ३७॥ ✎ 310

यह व्याख्या श्लोक 3.24.35 से 3.24.37 तककी एक साथ है।

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—लौकिकम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 355)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #310 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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