श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! प्रजापति कर्दमके आदेशमें गौरव-बुद्धि होनेसे देवहूतिने उसपर पूर्ण विश्वास किया और वह निर्विकार, जगद्गुरु भगवान् श्रीपुरुषोत्तमकी आराधना करने लगी॥ ५॥
देवहूत्यपि संदेशं गौरवेण प्रजापतेः।
सम्यक् श्रद्धाय पुरुषं कूटस्थमभजद्गुरुम्॥ ५
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! प्रजापति कर्दमके आदेशमें गौरव-बुद्धि होनेसे देवहूतिने उसपर पूर्ण विश्वास किया और वह निर्विकार, जगद्गुरु भगवान् श्रीपुरुषोत्तमकी आराधना करने लगी॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.24.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 352) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/24/5/