श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

देवहूत्यपि संदेशं गौरवेण प्रजापतेः।

सम्यक् श्रद्धाय पुरुषं कूटस्थमभजद‍्गुरुम्॥ ५

devahūtyapi saṃdeśaṃ gauraveṇa prajāpateḥ|

samyak śraddhāya puruṣaṃ kūṭasthamabhajadgurum|| 5

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! प्रजापति कर्दमके आदेशमें गौरव-बुद्धि होनेसे देवहूतिने उसपर पूर्ण विश्वास किया और वह निर्विकार, जगद‍्गुरु भगवान् श्रीपुरुषोत्तमकी आराधना करने लगी॥ ५॥

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