श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम्।

गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये॥ १५

cetaḥ khalvasya bandhāya muktaye cātmano matam|

guṇeṣu saktaṃ bandhāya rataṃ vā puṃsi muktaye|| 15

अर्थ

इस जीवके बन्धन और मोक्षका कारण मन ही माना गया है। विषयोंमें आसक्त होनेपर वह बन्धनका हेतु होता है और परमात्मामें अनुरक्त होनेपर वही मोक्षका कारण बन जाता है॥ १५॥

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