॥ श्रीहरिः ॥
न ह्यस्य वर्ष्मणः पुंसां वरिम्णः सर्वयोगिनाम्।
विश्रुतौ श्रुतदेवस्य भूरि तृप्यन्ति मेऽसवः॥ २
na hyasya varṣmaṇaḥ puṃsāṃ varimṇaḥ sarvayoginām|
viśrutau śrutadevasya bhūri tṛpyanti me'savaḥ|| 2
अर्थ
मैंने भगवान्के बहुत-से चरित्र सुने हैं, तथापि इन योगिप्रवर पुरुषश्रेष्ठ कपिलजीकी कीर्तिको सुनते-सुनते मेरी इन्द्रियाँ तृप्त नहीं होतीं॥ २॥
न ह्यस्य वर्ष्मणः पुंसां वरिम्णः सर्वयोगिनाम्।
विश्रुतौ श्रुतदेवस्य भूरि तृप्यन्ति मेऽसवः॥ २
मैंने भगवान्के बहुत-से चरित्र सुने हैं, तथापि इन योगिप्रवर पुरुषश्रेष्ठ कपिलजीकी कीर्तिको सुनते-सुनते मेरी इन्द्रियाँ तृप्त नहीं होतीं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.25.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 357) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/25/2/