श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

भक्‍त्या पुमांजातविराग ऐन्द्रियाद्

दृष्टश्रुतान्मद्रचनानुचिन्तया ।

चित्तस्य यत्तो ग्रहणे योगयुक्तो

यतिष्यते ऋजुभिर्योगमार्गैः॥ २६

bhaktyā pumāṃjātavirāga aindriyād

dṛṣṭaśrutānmadracanānucintayā |

cittasya yatto grahaṇe yogayukto

yatiṣyate ṛjubhiryogamārgaiḥ|| 26

अर्थ

फिर मेरी सृष्टि आदि लीलाओंका चिन्तन करनेसे प्राप्त हुई भक्तिके द्वारा लौकिक एवं पारलौकिक सुखोंमें वैराग्य हो जानेपर मनुष्य सावधानतापूर्वक योगके भक्तिप्रधान सरल उपायोंसे समाहित होकर मनोनिग्रहके लिये यत्न करेगा॥ २६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें