॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.25.28
देवहूतिरुवाच
काचित्त्वय्युचिता भक्तिः कीदृशी मम गोचरा।
यया पदं ते निर्वाणमंजसान्वाश्नवा अहम्॥ २८
kācittvayyucitā bhaktiḥ kīdṛśī mama gocarā|
yayā padaṃ te nirvāṇamaṃjasānvāśnavā aham|| 28
अर्थ
देवहूतिने कहा—भगवन्! आपकी समुचित भक्तिका स्वरूप क्या है? और मेरी-जैसी अबलाओंके लिये कैसी भक्ति ठीक है, जिससे कि मैं सहजमें ही आपके निर्वाणपदको प्राप्त कर सकूँ?॥ २८॥ निर्वाणस्वरूप प्रभो! जिसके द्वारा तत्त्वज्ञान होता है और जो लक्ष्यको बेधनेवाले बाणके समान भगवान्की प्राप्ति करानेवाला है, वह आपका कहा हुआ योग कैसा है और उसके कितने अंग हैं?॥ २९॥ ✎ 313