॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.25.38
न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपे
नङ्क्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढि हेतिः।
येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च
सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम्॥ ३८
na karhicinmatparāḥ śāntarūpe
naṅkṣyanti no me'nimiṣo leḍhi hetiḥ|
yeṣāmahaṃ priya ātmā sutaśca
sakhā guruḥ suhṛdo daivamiṣṭam|| 38
अर्थ
जिनका एकमात्र मैं ही प्रिय, आत्मा, पुत्र, मित्र, गुरु, सुहृद् और इष्टदेव हूँ—वे मेरे ही आश्रयमें रहनेवाले भक्तजन शान्तिमय वैकुण्ठधाममें पहुँचकर किसी प्रकार भी इन दिव्य भोगोंसे रहित नहीं होते और न उन्हें मेरा कालचक्र ही ग्रस सकता है॥ ३८॥✎ 1311