श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सूत उवाच

द्वैपायनसखस्त्वेवं मैत्रेयो भगवांस्तथा।

प्राहेदं विदुरं प्रीत आन्वीक्षिक्यां प्रचोदितः॥ ४

dvaipāyanasakhastvevaṃ maitreyo bhagavāṃstathā|

prāhedaṃ viduraṃ prīta ānvīkṣikyāṃ pracoditaḥ|| 4

अर्थ

सूतजी कहते हैं—मुने! आपकी ही भाँति जब विदुरने भी यह आत्मज्ञानविषयक प्रश्न किया, तो श्रीव्यासजीके सखा भगवान् मैत्रेयजी प्रसन्‍न होकर इस प्रकार कहने लगे॥ ४॥✎ 1310

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1310 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): आत्म-ज्ञानविषयक → आत्मज्ञानविषयक

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