सूतजी कहते हैं—मुने! आपकी ही भाँति जब विदुरने भी यह आत्मज्ञानविषयक प्रश्न किया, तो श्रीव्यासजीके सखा भगवान् मैत्रेयजी प्रसन्न होकर इस प्रकार कहने लगे॥ ४॥✎ 1310
द्वैपायनसखस्त्वेवं मैत्रेयो भगवांस्तथा।
प्राहेदं विदुरं प्रीत आन्वीक्षिक्यां प्रचोदितः॥ ४
सूतजी कहते हैं—मुने! आपकी ही भाँति जब विदुरने भी यह आत्मज्ञानविषयक प्रश्न किया, तो श्रीव्यासजीके सखा भगवान् मैत्रेयजी प्रसन्न होकर इस प्रकार कहने लगे॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.25.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 357) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/25/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1310 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): आत्म-ज्ञानविषयक → आत्मज्ञानविषयक