श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि।

चेष्टा यतः स भगवान् काल इत्युपलक्षितः॥ १७

prakṛterguṇasāmyasya nirviśeṣasya mānavi|

ceṣṭā yataḥ sa bhagavān kāla ityupalakṣitaḥ|| 17

अर्थ

मनुपुत्रि! जिनकी प्रेरणासे गुणोंकी साम्यावस्थारूप निर्विशेष प्रकृतिमें गति उत्पन्‍न होती है, वास्तवमें वे पुरुषरूप भगवान् ही ‘काल’ कहे जाते हैं॥ १७॥✎ 318

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #318 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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