इस भूत, इन्द्रिय और मनरूप अहंकारको ही पण्डितजन साक्षात् ‘संकर्षण’ नामक सहस्र सिरवाले अनन्तदेव कहते हैं॥ २५॥✎ 319320
सहस्रशिरसं साक्षाद्यमनन्तं प्रचक्षते।
सङ्कर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम्॥ २५
इस भूत, इन्द्रिय और मनरूप अहंकारको ही पण्डितजन साक्षात् ‘संकर्षण’ नामक सहस्र सिरवाले अनन्तदेव कहते हैं॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 364) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/26/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)