श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

वैकारिकाद्विकुर्वाणान्मनस्तत्त्वमजायत।

यत्सङ्कल्पविकल्पाभ्यां वर्तते कामसम्भवः॥ २७

vaikārikādvikurvāṇānmanastattvamajāyata|

yatsaṅkalpavikalpābhyāṃ vartate kāmasambhavaḥ|| 27

अर्थ

उपर्युक्त तीन प्रकारके अहंकारमेंसे वैकारिक अहंकारके विकृत होनेपर उससे मन हुआ, जिसके संकल्प-विकल्पोंसे कामनाओंकी उत्पत्ति होती है॥ २७॥✎ 319 320

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #319 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #320 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें