साध्वि! फिर तैजस अहंकारमें विकार होनेपर उससे बुद्धितत्त्व उत्पन्न हुआ। वस्तुका स्फुरणरूप विज्ञान और इन्द्रियोंके व्यापारमें सहायक होना—पदार्थोंका विशेष ज्ञान करना—ये बुद्धिके कार्य हैं॥ २९॥
तैजसात्तु विकुर्वाणाद् बुद्धितत्त्वमभूत्सति।
द्रव्यस्फुरणविज्ञानमिन्द्रियाणामनुग्रहः ॥ २९
साध्वि! फिर तैजस अहंकारमें विकार होनेपर उससे बुद्धितत्त्व उत्पन्न हुआ। वस्तुका स्फुरणरूप विज्ञान और इन्द्रियोंके व्यापारमें सहायक होना—पदार्थोंका विशेष ज्ञान करना—ये बुद्धिके कार्य हैं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 365) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/26/29/