श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

मृदुत्वं कठिनत्वं च शैत्यमुष्णत्वमेव च।

एतत्स्पर्शस्य स्पर्शत्वं तन्मात्रत्वं नभस्वतः॥ ३६

mṛdutvaṃ kaṭhinatvaṃ ca śaityamuṣṇatvameva ca|

etatsparśasya sparśatvaṃ tanmātratvaṃ nabhasvataḥ|| 36

अर्थ

कोमलता, कठोरता, शीतलता और उष्णता तथा वायुका सूक्ष्म रूप होना—ये स्पर्शके लक्षण हैं॥ ३६॥✎ 321

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #321 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें