कारणमय जलमें स्थित उस तेजोमय अण्डसे उठकर उस विराट् पुरुषने पुनः उसमें प्रवेश किया और फिर उसमें कई प्रकारके छिद्र किये॥ ५३॥
हिरण्मयादण्डकोशादुत्थाय सलिलेशयात्।
तमाविश्य महादेवो बहुधा निर्बिभेद खम्॥ ५३
कारणमय जलमें स्थित उस तेजोमय अण्डसे उठकर उस विराट् पुरुषने पुनः उसमें प्रवेश किया और फिर उसमें कई प्रकारके छिद्र किये॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 367) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/26/53/