उससे वीर्य और वीर्यके बाद लिंगका अभिमानी आपोदेव (जल) उत्पन्न हुआ। फिर गुदा प्रकट हुई, उससे अपानवायु और अपानके बाद उसका अभिमानी लोकोंको भयभीत करनेवाला मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ॥ ५७॥
रेतस्तस्मादाप आसन्निरभिद्यत वै गुदम्।
गुदादपानोऽपानाच्च मृत्युर्लोकभयङ्करः॥ ५७
उससे वीर्य और वीर्यके बाद लिंगका अभिमानी आपोदेव (जल) उत्पन्न हुआ। फिर गुदा प्रकट हुई, उससे अपानवायु और अपानके बाद उसका अभिमानी लोकोंको भयभीत करनेवाला मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 368) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/57/