श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.57

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

रेतस्तस्मादाप आसन्‍निरभिद्यत वै गुदम्।

गुदादपानोऽपानाच्च मृत्युर्लोकभयङ्करः॥ ५७

retastasmādāpa āsannirabhidyata vai gudam|

gudādapāno'pānācca mṛtyurlokabhayaṅkaraḥ|| 57

अर्थ

उससे वीर्य और वीर्यके बाद लिंगका अभिमानी आपोदेव (जल) उत्पन्‍न हुआ। फिर गुदा प्रकट हुई, उससे अपानवायु और अपानके बाद उसका अभिमानी लोकोंको भयभीत करनेवाला मृत्युदेवता उत्पन्‍न हुआ॥ ५७॥

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