किन्तु जब वही प्राकृत गुणोंसे अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है, तब अहंकारसे मोहित होकर ‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा मानने लगता है॥ २॥
स एष यर्हि प्रकृतेर्गुणेष्वभिविषज्जते।
अहंक्रियाविमूढात्मा कर्तास्मीत्यभिमन्यते॥ २
किन्तु जब वही प्राकृत गुणोंसे अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है, तब अहंकारसे मोहित होकर ‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा मानने लगता है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.27.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 370) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/27/2/