श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

मद्भक्तः प्रतिबुद्धार्थो मत्प्रसादेन भूयसा।

निःश्रेयसं स्वसंस्थानं कैवल्याख्यं मदाश्रयम्॥ २८

madbhaktaḥ pratibuddhārtho matprasādena bhūyasā|

niḥśreyasaṃ svasaṃsthānaṃ kaivalyākhyaṃ madāśrayam|| 28

अर्थ

मेरा वह धैर्यवान् भक्त मेरी ही महती कृपासे तत्त्वज्ञान प्राप्त करके आत्मानुभवके द्वारा सारे संशयोंसे मुक्त हो जाता है और फिर लिंगदेहका नाश होनेपर एकमात्र मेरे ही आश्रित अपने स्वरूपभूत कैवल्यसंज्ञक मंगलमय पदको सहजमें ही प्राप्त कर लेता है, जहाँ पहुँचनेपर योगी फिर लौटकर नहीं आता॥ २८-२९॥✎ 323 1597

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #323 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1597 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्मलोक-पर्यन्त → ब्रह्मलोकपर्यन्त

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