इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि असन्मार्ग (विषय-चिन्तन) में फँसे हुए चित्तको तीव्र भक्तियोग और वैराग्यके द्वारा धीरे-धीरे अपने वशमें लावे॥ ५॥
अत एव शनैश्चित्तं प्रसक्तमसतां पथि।
भक्तियोगेन तीव्रेण विरक्त्या च नयेद्वशम्॥ ५
इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि असन्मार्ग (विषय-चिन्तन) में फँसे हुए चित्तको तीव्र भक्तियोग और वैराग्यके द्वारा धीरे-धीरे अपने वशमें लावे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.27.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 370) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/27/5/