उनका पवित्र यश परम कीर्तनीय है और वे राजा बलि आदि परम यशस्वियोंके भी यशको बढ़ानेवाले हैं। इस प्रकार श्रीनारायणदेवका सम्पूर्ण अंगोंके सहित तबतक ध्यान करे, जबतक चित्त वहाँसे हटे नहीं॥ १८॥✎ 327
कीर्तन्यतीर्थयशसं पुण्यश्लोकयशस्करम्।
ध्यायेद्देवं समग्रांगं यावन्न च्यवते मनः॥ १८
उनका पवित्र यश परम कीर्तनीय है और वे राजा बलि आदि परम यशस्वियोंके भी यशको बढ़ानेवाले हैं। इस प्रकार श्रीनारायणदेवका सम्पूर्ण अंगोंके सहित तबतक ध्यान करे, जबतक चित्त वहाँसे हटे नहीं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.28.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 375) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/28/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)