फिर विपक्षी वीरोंके रुधिरसे सनी हुई प्रभुकी प्यारी कौमोदकी गदाका, भौंरोंके शब्दसे गुंजायमान वनमालाका और उनके कण्ठमें सुशोभित सम्पूर्ण जीवोंके निर्मलतत्त्वरूप कौस्तुभमणिका ध्यान करे*॥ २८॥
कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत
दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन ।
मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां
चैत्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे॥ २८
फिर विपक्षी वीरोंके रुधिरसे सनी हुई प्रभुकी प्यारी कौमोदकी गदाका, भौंरोंके शब्दसे गुंजायमान वनमालाका और उनके कण्ठमें सुशोभित सम्पूर्ण जीवोंके निर्मलतत्त्वरूप कौस्तुभमणिका ध्यान करे॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.28.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 377) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/28/28/
टिप्पणियाँ
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‘आत्मानमस्य जगतो निर्लेपमगुणामलम्। विभर्ति कौस्तुभमणिं स्वरूपं भगवान् हरिः॥’
अर्थात् इस जगत्की निर्लेप, निर्गुण, निर्मल तथा स्वरूपभूत आत्माको कौस्तुभमणिके रूपमें भगवान् धारण करते हैं।