श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

तस्यावलोकमधिकं कृपयातिघोर-

तापत्रयोपशमनाय निसृष्टमक्ष्णोः।

स्निग्धस्मितानुगुणितं विपुलप्रसादं

ध्यायेच्चिरं विततभावनया गुहायाम्॥ ३१

tasyāvalokamadhikaṃ kṛpayātighora-

tāpatrayopaśamanāya nisṛṣṭamakṣṇoḥ|

snigdhasmitānuguṇitaṃ vipulaprasādaṃ

dhyāyecciraṃ vitatabhāvanayā guhāyām|| 31

अर्थ

हृदयगुहामें चिरकालतक भक्तिभावसे भगवान्‌के नेत्रोंकी चितवनका ध्यान करना चाहिये, जो कृपासे और प्रेमभरी मुसकानसे क्षण-क्षण अधिकाधिक बढ़ती रहती है, विपुल प्रसादकी वर्षा करती रहती है और भक्तजनोंके अत्यन्त घोर तीनों तापोंको शान्त करनेके लिये ही प्रकट हुई है॥ ३१॥

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