श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षेतानन्यभावेन भूतेष्विव तदात्मताम्॥ ४२

sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani|

īkṣetānanyabhāvena bhūteṣviva tadātmatām|| 42

अर्थ

जिस प्रकार देहदृष्टिसे जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—चारों प्रकारके प्राणी पंचभूतमात्र हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जीवोंमें आत्माको और आत्मामें सम्पूर्ण जीवोंको अनन्यभावसे अनुगत देखे॥ ४२॥✎ 332 333

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #332 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #333 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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