आरम्भमें बायें नासिकासे पूरक, कुम्भक और रेचक करे, फिर इसके विपरीत दाहिनी नासिकासे प्राणायाम करके प्राणके मार्गका शोधन करे—जिससे चित्त स्थिर और निश्चल हो जाय॥ ९॥
प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकैः।
प्रतिकूलेन वा चित्तं यथा स्थिरमचंचलम्॥ ९
आरम्भमें बायें नासिकासे पूरक, कुम्भक और रेचक करे, फिर इसके विपरीत दाहिनी नासिकासे प्राणायाम करके प्राणके मार्गका शोधन करे—जिससे चित्त स्थिर और निश्चल हो जाय॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.28.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 374) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/28/9/