श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात्।

एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत्॥ २०

yathā vātaratho ghrāṇamāvṛṅkte gandha āśayāt|

evaṃ yogarataṃ ceta ātmānamavikāri yat|| 20

अर्थ

जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़कर जानेवाला गन्ध अपने आश्रय पुष्पसे घ्राणेन्द्रियतक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भक्तियोगमें तत्पर और राग-द्वेषादि विकारोंसे शून्य चित्त परमात्माको प्राप्त कर लेता है॥ २०॥

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