जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़कर जानेवाला गन्ध अपने आश्रय पुष्पसे घ्राणेन्द्रियतक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भक्तियोगमें तत्पर और राग-द्वेषादि विकारोंसे शून्य चित्त परमात्माको प्राप्त कर लेता है॥ २०॥
यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात्।
एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत्॥ २०
जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़कर जानेवाला गन्ध अपने आश्रय पुष्पसे घ्राणेन्द्रियतक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भक्तियोगमें तत्पर और राग-द्वेषादि विकारोंसे शून्य चित्त परमात्माको प्राप्त कर लेता है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 381) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/20/