बार-बार प्रयत्न करनेपर भी जब इसकी कोई जीविका नहीं चलती, तो यह लोभवश अधीर हो जानेसे दूसरेके धनकी इच्छा करने लगता है॥ ११॥
वार्तायां लुप्यमानायामारब्धायां पुनः पुनः।
लोभाभिभूतो निःसत्त्वः परार्थे कुरुते स्पृहाम्॥ ११
बार-बार प्रयत्न करनेपर भी जब इसकी कोई जीविका नहीं चलती, तो यह लोभवश अधीर हो जानेसे दूसरेके धनकी इच्छा करने लगता है॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 386) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/30/11/