॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.30.15
आस्तेऽवमत्योपन्यस्तं गृहपाल इवाहरन्।
आमयाव्यप्रदीप्ताग्निरल्पाहारोऽल्पचेष्टितः॥ १५
āste'vamatyopanyastaṃ gṛhapāla ivāharan|
āmayāvyapradīptāgniralpāhāro'lpaceṣṭitaḥ|| 15
अर्थ
फिर भी इसे वैराग्य नहीं होता। जिन्हें उसने स्वयं पाला था, वे ही अब उसका पालन करते हैं, वृद्धावस्थाके कारण इसका रूप बिगड़ जाता है, शरीर रोगी हो जाता है, अग्नि मन्द पड़ जाती है, भोजन और पुरुषार्थ दोनों ही कम हो जाते हैं। वह मरणोन्मुख होकर घरमें पड़ा रहता है और कुत्तेकी भाँति स्त्री-पुत्रादिके अपमानपूर्वक दिये हुए टुकड़े खाकर जीवन-निर्वाह करता है॥ १४-१५॥