श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.21

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

तयोर्निर्भिन्‍नहृदयस्तर्जनैर्जातवेपथुः ।

पथि श्‍वभिर्भक्ष्यमाण आर्तोऽघं स्वमनुस्मरन्॥ २१

tayornirbhinnahṛdayastarjanairjātavepathuḥ |

pathi śvabhirbhakṣyamāṇa ārto'ghaṃ svamanusmaran|| 21

अर्थ

उनकी घुड़कियोंसे उसका हृदय फटने और शरीर काँपने लगता है, मार्गमें उसे कुत्ते नोचते हैं। उस समय अपने पापोंको याद करके वह व्याकुल हो उठता है॥ २१॥ भूख-प्यास उसे बेचैन कर देती है तथा घाम, दावानल और लूओंसे वह तप जाता है। ऐसी अवस्थामें जल और विश्रामस्थानसे रहित उस तप्तबालुकामय मार्गमें जब उसे एक पग आगे बढ़नेकी भी शक्ति नहीं रहती, यमदूत उसकी पीठपर कोड़े बरसाते हैं, तब बड़े कष्टसे उसे चलना ही पड़ता है॥ २२॥

यह व्याख्या श्लोक 3.30.21 से 3.30.22 तककी एक साथ है।

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