श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

जन्तुर्वै भव एतस्मिन् यां यां योनिमनुव्रजेत्।

तस्यां तस्यां स लभते निर्वृतिं न विरज्यते॥ ४

janturvai bhava etasmin yāṃ yāṃ yonimanuvrajet|

tasyāṃ tasyāṃ sa labhate nirvṛtiṃ na virajyate|| 4

अर्थ

इस संसारमें यह जीव जिस-जिस योनिमें जन्म लेता है, उसी-उसीमें आनन्द मानने लगता है और उससेविरक्त नहीं होता॥ ४॥✎ 337 338

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #337 शब्दोंके बीचका स्थान: सुख-सामान → सुख-सा मान
  • #338 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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