श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

चतुर्भिर्धातवः सप्त पञ्चभिः क्षुत्तृडुद्भवः।

षड्भिर्जरायुणा वीतः कुक्षौ भ्राम्यति दक्षिणे॥ ४

caturbhirdhātavaḥ sapta pañcabhiḥ kṣuttṛḍudbhavaḥ|

ṣaḍbhirjarāyuṇā vītaḥ kukṣau bhrāmyati dakṣiṇe|| 4

अर्थ

चार मासमें उसमें मांसादि सातों धातुएँ पैदा हो जाती हैं, पाँचवें महीनेमें भूख-प्यास लगने लगती है और छठे मासमें झिल्लीसे लिपटकर वह दाहिनी कोखमें घूमने लगता है॥ ४॥

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