श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

द्रव्योपलब्धिस्थानस्य द्रव्येक्षायोग्यता यदा।

तत्पञ्चत्वमहं मानादुत्पत्तिर्द्रव्यदर्शनम्॥ ४५

dravyopalabdhisthānasya dravyekṣāyogyatā yadā|

tatpañcatvamahaṃ mānādutpattirdravyadarśanam|| 45

अर्थ

पदार्थोंकी उपलब्धिके स्थानरूप इस स्थूलशरीरमें जब उनको ग्रहण करनेकी योग्यता नहीं रहती, यह उसका मरण है और यह स्थूलशरीर ही मैं हूँ—इस अभिमानके साथ उसे देखना उसका जन्म है॥ ४५॥

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