श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.47

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तस्मान्‍न कार्यः सन्त्रासो न कार्पण्यं न सम्भ्रमः।

बुद‍्ध्वा जीवगतिं धीरो मुक्तसङ्गश्‍चरेदिह॥ ४७

tasmānna kāryaḥ santrāso na kārpaṇyaṃ na sambhramaḥ|

buddhvā jīvagatiṃ dhīro muktasaṅgaścarediha|| 47

अर्थ

अतः मुमुक्ष पुरुषको मरणादिसे भय, दीनता अथवा मोह नहीं होना चाहिये। उसे जीवके स्वरूपको जानकर धैर्यपूर्वक निःसंगभावसे विचरना चाहिये तथा इस मायामय संसारमें योग-वैराग्य-युक्त सम्यक् ज्ञानमयी बुद्धिसे शरीरको निक्षेप (धरोहर)-की भाँति रखकर उसके प्रति अनासक्त रहते हुए विचरण करना चाहिये॥ ४७-४८॥

यह अर्थ श्लोक 47–48 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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