इसी प्रकार पूर्वोक्त ऋषिगण भी अपने-अपने कर्मानुसार ब्रह्मलोकके ऐश्वर्यको भोगकर भगवदिच्छासे गुणोंमें क्षोभ होनेपर पुनः इस लोकमें आ जाते हैं॥ १५॥
ऐश्वर्यं पारमेष्ठ्यं च तेऽपि धर्मविनिर्मितम्।
निषेव्य पुनरायान्ति गुणव्यतिकरे सति॥ १५
इसी प्रकार पूर्वोक्त ऋषिगण भी अपने-अपने कर्मानुसार ब्रह्मलोकके ऐश्वर्यको भोगकर भगवदिच्छासे गुणोंमें क्षोभ होनेपर पुनः इस लोकमें आ जाते हैं॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 397) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/32/15/