इसलिये माताजी! जिनके चरणकमल सदा भजनेयोग्य हैं, उन भगवान्का तुम उन्हींके गुणोंका आश्रय लेनेवाली भक्तिके द्वारा सब प्रकारसे (मन, वाणी और शरीरसे) भजन करो॥ २२॥
तस्मात्त्वं सर्वभावेन भजस्व परमेष्ठिनम्।
तद्गुणाश्रयया भक्त्या भजनीयपदाम्बुजम्॥ २२
इसलिये माताजी! जिनके चरणकमल सदा भजनेयोग्य हैं, उन भगवान्का तुम उन्हींके गुणोंका आश्रय लेनेवाली भक्तिके द्वारा सब प्रकारसे (मन, वाणी और शरीरसे) भजन करो॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 398) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/32/22/