श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम्।

अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणा॥ २८

jñānamekaṃ parācīnairindriyairbrahma nirguṇam|

avabhātyartharūpeṇa bhrāntyā śabdādidharmiṇā|| 28

अर्थ

ब्रह्म एक है, ज्ञानस्वरूप और निर्गुण है, तो भी वह बाह्यवृत्तियोंवाली इन्द्रियोंके द्वारा भ्रान्तिवश शब्दादि धर्मोंवाले विभिन्‍न पदार्थोंके रूपमें भास रहा है॥ २८॥

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